Wednesday, March 20, 2013

कर्म के सिद्धान्त


 
पूर्व जन्म के बारे मे अक्सर बहुत सी बातें सुनने मे आती है। विश्व के कई प्रमुख धर्म तो इस धारणा को सिरे से ही खारिज कर देते है लेकिन हिन्दू धर्म मे इसकी काफी मान्यता है। कहते है आत्मा कभी मरती नहीं सिर्फ चोले बदल जाते है। हर किसी को अपने कर्मानुसार या तो अच्छा चोला मिलता है या बुरा। किसी के पास सारे साधन होते है और कोई दर दर की ठोकरें खाने को विवश होता है। अगर आपने मानव रूपी चोले मे जन्म लिया है तो खुद को भाग्यशाली समझे। ना जाने कितनी योनियों में भटकने के बाद ये मनुष्य योनि प्राप्त हुई हो।

ईश्वर को अपनी सारी रचनाओं मे मानव ही अत्यधिक रूचिकर लगा क्योकि मानव उसकी हर रचना की प्रकृति को समझने मे सक्षम है। वह ईश्वर का महिमा मंडन भी कर सकता है और अपने कर्म से ईश्वर समान बनने का सामर्थ्य भी रखता है। केवल मानव योनि ही ऐसी योनि है जो जन्म-मरण के चक्कर से निकलने मे सक्षम है। आप इस बात का अंदाज़ा भी नहीं लगा सकते की एक पशु का जीवन कितना कठिन होता है। उनकी हर सुबह की शाम हो ऐसा जरूरी नही। हर पल संघर्षमय होता है। चोट लग जाए तो कोई प्राथमिक चिकित्सा देने भी नहीं आता। अगली बार खाना मिलेगा या नहीं इसकी कोई गारंटी नहीं होती। मित्रों मानव जीवन की महत्वता को समझकर कर्म करें। अगर मानव भी अपनी सारी ऊर्जा सिर्फ भोग विलास और ऐश्वर्य में ही व्यतीत करेगा तो जानवर और इंसान के बीच फर्क करना अत्यंत कठिन हो जाएगा।       

ज्ञान मानव को ईश्वर का एक वरदान है। मानव अगर ज्ञान की उपासना करे तो भगवान समान बन जाता है और अगर उपेक्षा करे तो दानव। मैं यह तो नहीं बता सकता कि सृष्टि पर मानव कब उत्तीर्ण हुआ था लेकिन इस जन्म मरण कि गुत्थी सुलझाने मे जरूर सहायता कर सकता हूँ। ऐसी मान्यता है  अगर देह त्याग के समय प्रभु का सुमिरन किया जाए तो मोक्ष के साथ सद्गति प्राप्त होती है। इसका सीधा सा अर्थ यह है आप जीवन भर जो भी करो लेकिन उस अंतिम छण यदि प्रभु सुमिरन कर लिया तो इस चक्र से मुक्ति मिल जाती है।      

कहने को तो बड़ी छोटी सी बात है मगर एक इच्छा या एक ख्वाइश इंसान को हमेशा इस जन्म-मृत्यु के चक्कर मे बांध कर रखती है। कहते है देह निर्वासन के समय अगर मन मे कोई भी इच्छा शेष रह जाए तो इंसान की मुक्ति नहीं होती और वह वापस जन्म लेता है। मुक्ति की ही आस लगाए हमारे साधू- महात्मा पूरा जीवन ताप व साधना मे बिताते हैं। मैं सोचता हूँ अगर मृत्यु के समय थोड़ी देर भगवान का ध्यान कर लेने से मुक्ति मिल जाती है तो फिर क्या ये साधू महात्मा पागल थे जो सब कुछ त्याग कर पूरा जीवन तप मे बिता दिया। असल ये गूढ रहस्य तो मन पर विजय पाना है। मन को वश मे करना ही मोक्ष रूपी द्वार की कुंजी है। मन के वश मे आते ही समस्त इंद्रियाँ वश मे आ जाती है। मन वश मे हो तो वह अंतिम पल भी सुखमई होता है।  कहते भी है “मन के जीते जीत है मन के हारे हार।”

अगर आज किसी को रुलाया है तो कल तुम्हें भी रोना पड़ेगा। अगर आज किसी की हानी की है तो कल तुम्हें  भी हानी होगी। कभी किसी जीव की उपेक्षा मत करो। हर जीव या मानव तुम्हारे पास किसी न किसी कार्मिक बंधन के कारण आता है। जीवात्माएँ तब एक दूसरे से जुड़ी रहती है जब तक उनका कार्मिक ऋण चुकता नहीं होता। जैसे ही ऋण पूरा हो जाता है बंधन खत्म। हम जिनहे भी अपने आस पास देखते है जैसे हमारे माता पिता, बंधु सखा ये सब कर्म बंधन के कारण ही है। अगर आज आपने किसी की हानी की, किसी को दुख पहुंचाया तो आप उसके ऋणी हो गए। वह जीवात्मा कभी न कभी आपसे वह ऋण सूत समेत वसूल करेगी। चाहे 2 जन्म और लेने पड़े।  इसलिए ऐसा दोष रहित जीवन जीने के लिए मन पर काबू होना अत्यधिक आवश्यक है। मन कमजोर हो तो सारी बुरी प्रवत्तियाँ प्रबल हो जाती है।

प्रभु नाम सुमिरन और ध्यान योग की उपासना से जीवन को सुखमय बनाने के लिए हमेशा तत्पर रहे।                 
Posted on 2:44 PM | Categories:

Wednesday, March 6, 2013

सुधर जाओ नेताओं

 
सूरज छिप गया था कहीं बादलों मे, अंधकार था इतना घना
अन्ना तुम क्या आए रोशनी आ गयी जिसकी न थी कल्पना।।
 
डरे डरे रहते थे हम इन आदमखोर सियासददानों से
भूल ही गए थे कभी मिलता था खाना इन गरीब मकानों में।।

सुन सकता हूँ फिर आवाज़ आ रही है आज मेरे कानों मे
भारत छोडो काले अंग्रेजों निकल पड़ी है तलवारें अपनी-अपनी मयानों से ।।
 
आज नहीं खरीद सकते हमें तुम, न हम बिकते दुकानों मे
माँ कि लाज बचानी है अब नहीं डरते हम इन हुक्मरानों से।।
निकल पड़े है सब मिलकर टक्कर लेने चट्टानों से, अब खैर नही तुम्हारी
हम लेते आशीर्वाद मंदिरों मे और दुआ मांगी जाती अज़ानों मे।।
 
तिरंगा आज थामा है हमने अब ये है जान से प्यारा
मर भी गए तो कब्र पर आएंगे लोग करने दीदार हमारा।।
नेताओं तुम खैर मनाओ अब अपनी, कब तक खुद को बचाओगे
लोकपाल आने के बाद या तो जेल जाओगे या मिट्टी मे मिल जाओगे।।
 
अरे नेताओं काम करो कुछ ऐसा सुभाष और गांधी के साथ नाम आए
नहीं सुधरे कहीं ऐसा न हो फोटो पर बच्चा भी पैंट खोल सुसू कर जाए।।

भक्ति और मन का संबंध


अधिकांश लोगों के मन मे प्रभु दर्शन कि लालसा हमेशा बनी रहती है फिर भी इस सुख से हमेशा वंचित रहते है। कुछ लोग मंदिर जाकर प्रभु से सिर्फ सौदेबाजी करते है तो कुछ फूल और 2 लड्डू चढ़ा कर जिम्मेदारी पूर्ण समझते है। किसी के तो सामने भगवान स्वयं प्रकट हो जाते है और किसी-किसी को जन्मो इंतज़ार करना पड़ता है। कुछ प्रश्न जो अधिकांश लोगो के मन मे रोज़ उठते होंगे।

“मैं रोज़ 1 घंटा सुबह माला फेरता हूँ। रोज़ आधा घंटा पोथी पढ़ता हूँ। मैं मंत्र जाप भी करता हूँ लेकिन भगवान है की खुश ही नहीं होते। मैं मंदिर भी जाता हूँ, माला भी चढ़ाता हूँ, भोग भी लगाता हूँ लेकिन फिर भी भगवान खुश नहीं होते। आखिर भगवान को ऐसा क्या चाहिए जो मैं नही कर सकता?”

ऐसा क्यों होता है जब हम किसी संत या महात्मा को देखते है तो मन मे ऐसे ख्याल आते है “ये मानव नहीं महा-मानव है” उन्होने ऐसा क्या किया जो हम नही कर सके?

प्रश्न ये उठता है की क्या भगवान पाठ करने, मंदिर मे घंटा बजाने, पोथी पढ़ने या मंतर करने से खुश होता है? अगर होता तो मंदिर के पुजारियों को प्रभु-दर्शन सुबह-शाम क्यों नहीं होते? कभी सोचा जो लोग सुबह शाम घंटा बजाते है या पोथी पढ़ते है उन्हे भगवान के प्रेम की अनुभूति क्यों नही होती?  क्यों वो इस प्रेम के सागर की एक बूंद को भी तरसते रहते है? और अगर भगवान मंदिर के घंटे या मंतर से खुश नहीं होते तो ऐसा क्या है जिससे भगवान खुश होते है?

मित्रों इस प्रश्न का उत्तर बहुत ही सरलता के साथ धन्ना भगत की लोक कथा पर आधारित दारा सिंह द्वारा सन 1974 में कृत फिल्म “किसान और भगवान” मे देखने को मिलता है। किस तरह अनपढ़ गँवार धन्ना भगत के मन की सरलता को देख प्रभु हरी धन्ना का दास बन उसके सारे कार्य पूर्ण करते है।

कबीर दास जी कहते है – पोथी पढ़ पढ़ कर जग मुआ पंडित भया न कोए। ढाई आखर प्रेम का पढ़े जो पंडित होए॥

अगर इतिहास के पन्नों को पलटे तो ऐसे बहुत उदाहरण देखने को मिलेंगे जहां श्रद्धा से चढ़ाया हुआ एक फूल ही काफी था प्रभु दर्शन को। प्रभु तो सिर्फ भावना के भूखे है।     

मन का स्थान भक्ति से ऊपर है। मन भाव है और भक्ति भाव का कर्म मे परिवर्तित रूप है।  मंदिर मे आरती करना , घंटा बजाना, मंतर करना, जाप करना, पोथी पढ़ना, हवन करना ये भक्त का भगवान के प्रति अपनी भावना प्रकट करने का साधन मात्र है लेकिन अगर इस कर्म से प्रेम भाव विरक्त हो जाए तो यह कर्मकांड व्यर्थ सिद्ध होगा। यह एक कटु सत्य है की भक्ति के मार्ग मे बिना मन या भाव के किए गए कर्म का कोई स्थान नहीं होता।

सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह उठता है कि मन को कैसे लगाए?  यह तो वो बेलगाम घोडा है जो कभी बस मे नहीं आता। जब पाठ करता हूँ तो ये ऑफिस की सैर कर रहा होता है। जब आरती करता हूँ तो ये नयी फिल्मों के बारे मैं सोच रहा होता है। मन तो उसी से लगता है जिसपर आसक्ति होती है, जिससे प्रेम होता है? जो कुछ भी मन को पसंद है वह हमेशा वही करने को उद्यत रहता है ।

सवाल यह भी है भगवान से प्रेम कैसे हो? प्रेम होगा तभी तो मन लगेगा। मन लगेगा तभी भक्ति भाव से किए गए कर्म प्रभु तक पहुचेंगे।

आपको यह जानकार अचंभा होगा दुख भगवान तक पहुचने की पहली सीढ़ी है। दुख की अवस्था मे किया गया प्रभु सुमिरन सामान्य अवस्था मे किए गए सुमिरन से काफी अलग होता है। महाभारत मे श्री कृष्ण जब कुंती से पूछते है उन्हे क्या चाहिए तब कुंती कहती है – हे प्रभु दुख और मेरा साथ कभी ना छूटे। जब भी मुझे पीड़ा होती है आप रक्षा करने आ जाते हो जिससे मुझे आपके दिव्य दर्शन होते है। आपके तो दर्शन मात्र से ही कर्म बंधन छिन्न-भिन्न हो जाते है और जन्म-मृत्यु के इस बंधन से मुक्ति मिल जाती है।   

अगर प्रभु भजन मे मन नहीं लगता तो निराश न हो। प्रभु को अत्यंत प्रिय कुछ ऐसी सरल बातें हैं  जिन्हे अपनाकर आप अपना जीवन स्वर्ग बना सकते है।

1॰ भूखों को खाना खिलाना – ये सबसे बड़ी मानव सेवा है। भूखों को खाना खिलाने वाले के दिल मे अपार प्रेम होता है और यह प्रभु को अत्यंत प्रिय है।

2॰ अहंकार का त्याग – “मैं मेरा मुझसे” इन शब्दो को अपने शब्दकोश से निकाल दे। “मैं” अहंकार का प्रतीक है। अहंकार रहित बच्चो को प्रभु के दरबार मे बिन मांगे मोती मिलते है।

3॰ कर्म मे कर्ता का भाव ना होना – अपना हर कर्म अच्छा या बुरा प्रभु को समर्पित कर दे। इससे आप कर्म बंधन से मुक्त हो जाएंगे। आपके द्वारा किए गए हर अच्छे ये बुरे कर्म का उत्तरदायित्व प्रभु का होगा।

4॰ हर जीव पर समान प्रेम रखना – प्रभु ने कभी किसी जीव जैसे मानव, पशु, पक्षी मे भेद-भाव नही किया। फिर हम कौन होते है प्रभु की संरचना मे भेद-भाव करने वाले। कभी किसी का तिरस्कार कर पाप के भागीदार न बने।  

 5॰ हर दिन अपनी सहूलियत से थोड़ी देर शांति मे प्रभु की याद मे बैठना या उनका नाम सुमिरन करना और उन्हे इस जीवन के लिए धन्यवाद देना। मानव जीवन सबको नहीं मिलता। कुछ तो पुण्य किए होंगे वरना क्या पता किसी जीव-जन्तु कि योनि मे फंसे होते।  

इतना सब करने के बाद प्रभु को एक बार निहार लेना। प्रभु खुद समक्ष आ जाएंगे।

साभार – मनीष
Posted on 12:44 PM | Categories:

Tuesday, February 5, 2013

क्या जातिवाद अभिशाप नहीं?


क्या जातिवाद अभिशाप नहीं?

हिन्दू संस्कृति की महानता पर अगर कुछ लेख लिखना शुरू करू तो शायद दिन कम पड़ जाए लेकिन वो शब्द मेरे न होंगे क्योकि मैं जो भी लिखूंगा वह सिर्फ सुनी सुनाई बातें होंगी। हिन्दू संस्कृति की महानता मैंने सिर्फ किताबों मे पढ़ी और लोगो से सुनी है। जो देखा वो बिलकुल विपरीत है।

मैंने सुना हिन्दू धर्म दया, साहिश्रुता और त्याग का प्रतीक है लेकिन मैंने दुनिया का ऐसा कोई और धर्म नहीं देखा जिसमे इतना भेदभाव है। कोई और ऐसा धर्म नहीं जिसमे धर्म के नाम पर लोग अपनों के लिए इतनी घृणा और तिरस्कार का भाव रखते है।    

जब हिन्दू समाज की कुरीतियों पर नज़र जाती है तो दिल बेचैन हो जाता है। सोचता हूँ ऐसा क्या सोचा होगा हमारे ऋषियों ने जो लोगो को जतियों और वर्णो मे बाट दिया। दुख होता है जब देखता हूँ किस तरह ऊँची जातियाँ निम्न जतियों का शोषण करती है। जब देखता हूँ किस तरह निम्न जातियों मे पैदा हुए अभागे आत्मसम्मान के लिए तरसते हैं।

हिन्दू संस्कृति ने हमेशा आत्म-सम्मान से जीना सिखाया शायद इसीलिए मुग़लों और अंग्रेजों के क्रूर 1000 साल के शासन के बाद भी देश मे आज हिन्दू संस्कृति जीवित है। गुरु गोविंद सिंह, छत्रपती शिवाजी, झाँसी की रानी जैसे वीरों ने इस संस्कृति को जीवित रखने के लिए अपना बलिदान दिया और समाज के लिए प्रेरणा श्रोत बने।    

किसी भी समाज मे संतुलन का आधार ज्ञान, धन और बल है। अगर ये तीनों किसी एक के हाथ मे केन्द्रित हो जाए तो समाज मे असंतुलन व्याप्त हो जाता है। इसी ज्ञान को आधार मानकर महान ऋषियों ने समाज को चार वर्णो (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्र) मे बांटा।

ब्राह्मण – जो ज्ञान अर्जित करता है वो ब्राह्मण है। लेकिन ज्ञान के इन पिपासुओं के लिए धन या सत्ता  वर्जित थी। भिक्षा मे मांग के खाना ही ब्राह्मण कहलाने का अधिकारी है। इनका मुख्य उद्देश्य ज्ञान के द्वारा समाज का कल्याण व मार्गदर्शन था। 

क्षत्रिय – जिनहोने शस्त्र उठाकर देश व समाज की रक्षा का भार उठाया वो क्षत्रिय कहलाए। इनका मुख्य उद्देश्य समाज का रक्षा करना था। 

वैश्य – इस श्रेणी मे वो लोग आते है जिनहोने व्यापार को अपना कर्म चुना। इनका मुख्य उद्देश्य धन के द्वारा समाज का कल्याण करना था।

शूद्र –मानव सेवा को जिनहोने अपना धर्म बनाया वो शूद्र कहलाए। इनकी ज़िम्मेदारी समाज और वातावरण को स्वच्छ रखने की थी।

लेकिन समय के साथ हिन्दू धर्म मे घोर परिवर्तन आए। अब लोग कर्म से नहीं जन्म से जाने जाते है। ब्राह्मण कुल मे पैदा हुआ एक चोर भी खुद को शूरवीर मानता है।  क्या ऐसे समाज पर किसी को गर्व हो सकता है जो अपने ही भाइयों को धर्म के नाम पर जिल्लत भरी जिंदगी देता हो? जो भाई खुद को कट्टर हिन्दू बोलकर सुबह शाम धर्म का डंका पीटते है मैं उनसे पूछना चाहता है ऐसा क्या है जिसपर आपने इतना गर्व करते है? अधिकांश शहरों मे रहने वाले जिनहोने कभी गाव देखा नहीं या कभी वहाँ रहे नहीं आपसे विनती है जरा गाव मे जाकर रहे और देखे कितनी घृणा और अत्याचार व्याप्त है लोगों मे।

आज भी दलितों को इंसान नहीं समझा जाता। न साथ पढ़ते दिया जाता है न खेलने। न साथ रहने दिया जाता है न खाने। अगर कोई दलित घर के अंदर आ जाए तो गंगा-जल से घर पवित्र करते है। हर पल उन्हे ये एहसास दिलाया जाता है की वो दलित है। मै थूकता हूँ ऐसी मानसिकता पर।  राम के नाम का डंका पीटने वाले भूल जाते है की राम ने शबरी के झूठे फल भी खाये थे।

बचपन मे पढ़ा था भारत देश अनेकताओं मे एकता का देश है लेकिन हिन्दू धर्म मे ये बात ठीक नहीं बैठती क्योकि इसमे एकता नहीं है। हर कोई या तो पंडित है या ठाकुर। या तो बनिया है या दलित। या तो यूपी वाला है या मराठी। या तो गुजरती है या हरयानवी।

हिन्दू कहलाने का अधिकारी  सिर्फ वही है जो जात-पात या क्षेत्रियता से ऊपर उठकर सोच सके बाकी तो मेरी नज़र मे सिर्फ ढोंगी है।

साभार – मनीष

Monday, February 4, 2013

कविता - मेरा भारत देश




मेरा भारत देश

इतिहास की पुस्तक मे देखा मैंने स्वर्णिम कल
जहां भारत देश था मेरा युग परिवर्तन विकल।

राम की मर्यादा जहां और शुश्रुत का ज्ञान था
पंच धर्मो की जननी वह भारत देश महान था।

महावीर जहां जन्मे और बुद्ध का विस्तार था
नानक संग देश मेरा विश्व का अवतार था|

सिंधु तट पर जन्म हुआ, थी एक नयी दुनिया
सब कहते है देश मेरा, थी सोने की चिड़िया।

कनक समान चरित्र राम-राज का भाव था।
सत्य प्रेम और करुणा का ना अभाव था।

पुस्तक से बाहर आया तो घोर अंधकार था।
नफरत और शोषण ही धर्म का आधार था।

 सोचा समझूँ जरा अब मैं आज के भारत को
बहुत पढ़ा किताबों मे मंदिर और मजारों को।

मैंने पूछा एक से – “क्या भारत को देखा है?”
कौन सा भारत कैसा भारत अपनी तो बस पेट-पूजा है।

एक पंडित से पूछा मैंने - क्या भगवान को देखा है?
बोला दो फूल चार लड्डू यही तो खाकर बैठा है।

फिर एक से पूछा ये नेता कैसा होता है?
सफ़ेद गाड़ी पुच्छल तारा कभी-कभी दिखता है।

फिर पूछा टीचर से – पढ़ा था मैंने भारत मे अच्छे लोग ही होते है,
लेकिन यहाँ तो बच्चे बिलख बिलख रोते है?
टीचर बोली – चोर लुटेरे अब यहाँ सरदार बने बैठे है
बच्चों का दूध भी अब नेता ही पी जाते है।

फिर एक बोला - बाहर मत जा आज तो होता दंगा है
राम और रहीम का ये अजीब पंगा है।

साभार – मनीष