पूर्व जन्म के बारे मे अक्सर बहुत सी बातें सुनने मे आती
है। विश्व के कई प्रमुख धर्म तो इस धारणा को सिरे से ही खारिज कर देते है लेकिन
हिन्दू धर्म मे इसकी काफी मान्यता है। कहते है आत्मा कभी मरती नहीं सिर्फ चोले बदल
जाते है। हर किसी को अपने कर्मानुसार या तो अच्छा चोला मिलता है या बुरा। किसी के
पास सारे साधन होते है और कोई दर दर की ठोकरें खाने को विवश होता है। अगर आपने मानव
रूपी चोले मे जन्म लिया है तो खुद को भाग्यशाली समझे। ना जाने कितनी योनियों में भटकने
के बाद ये मनुष्य योनि प्राप्त हुई हो।
ईश्वर को अपनी सारी रचनाओं मे मानव ही अत्यधिक रूचिकर लगा
क्योकि मानव उसकी हर रचना की प्रकृति को समझने मे सक्षम है। वह ईश्वर का महिमा
मंडन भी कर सकता है और अपने कर्म से ईश्वर समान बनने का सामर्थ्य भी रखता है। केवल
मानव योनि ही ऐसी योनि है जो जन्म-मरण के चक्कर से निकलने मे सक्षम है। आप इस बात
का अंदाज़ा भी नहीं लगा सकते की एक पशु का जीवन कितना कठिन होता है। उनकी हर सुबह
की शाम हो ऐसा जरूरी नही। हर पल संघर्षमय होता है। चोट लग जाए तो कोई प्राथमिक
चिकित्सा देने भी नहीं आता। अगली बार खाना मिलेगा या नहीं इसकी कोई गारंटी नहीं
होती। मित्रों मानव जीवन की महत्वता को समझकर कर्म करें। अगर मानव भी अपनी सारी
ऊर्जा सिर्फ भोग विलास और ऐश्वर्य में ही व्यतीत करेगा तो जानवर और इंसान के बीच
फर्क करना अत्यंत कठिन हो जाएगा।
ज्ञान मानव को ईश्वर का एक वरदान है। मानव अगर ज्ञान की
उपासना करे तो भगवान समान बन जाता है और अगर उपेक्षा करे तो दानव। मैं यह तो नहीं
बता सकता कि सृष्टि पर मानव कब उत्तीर्ण हुआ था लेकिन इस जन्म मरण कि गुत्थी
सुलझाने मे जरूर सहायता कर सकता हूँ। ऐसी मान्यता है अगर देह त्याग के समय प्रभु का सुमिरन किया जाए
तो मोक्ष के साथ सद्गति प्राप्त होती है। इसका सीधा सा अर्थ यह है आप जीवन भर जो
भी करो लेकिन उस अंतिम छण यदि प्रभु सुमिरन कर लिया तो इस चक्र से मुक्ति मिल जाती
है।
कहने को तो बड़ी छोटी सी बात है मगर एक इच्छा या एक ख्वाइश
इंसान को हमेशा इस जन्म-मृत्यु के चक्कर मे बांध कर रखती है। कहते है देह निर्वासन
के समय अगर मन मे कोई भी इच्छा शेष रह जाए तो इंसान की मुक्ति नहीं होती और वह वापस
जन्म लेता है। मुक्ति की ही आस लगाए हमारे साधू- महात्मा पूरा जीवन ताप व साधना मे
बिताते हैं। मैं सोचता हूँ अगर मृत्यु के समय थोड़ी देर भगवान का ध्यान कर लेने से
मुक्ति मिल जाती है तो फिर क्या ये साधू महात्मा पागल थे जो सब कुछ त्याग कर पूरा जीवन
तप मे बिता दिया। असल ये गूढ रहस्य तो मन पर विजय पाना है। मन को वश मे करना ही मोक्ष
रूपी द्वार की कुंजी है। मन के वश मे आते ही समस्त इंद्रियाँ वश मे आ जाती है। मन वश
मे हो तो वह अंतिम पल भी सुखमई होता है। कहते
भी है “मन के जीते जीत है मन के हारे हार।”
अगर आज किसी को रुलाया है तो कल तुम्हें भी रोना पड़ेगा। अगर
आज किसी की हानी की है तो कल तुम्हें भी हानी
होगी। कभी किसी जीव की उपेक्षा मत करो। हर जीव या मानव तुम्हारे पास किसी न किसी कार्मिक
बंधन के कारण आता है। जीवात्माएँ तब एक दूसरे से जुड़ी रहती है जब तक उनका कार्मिक ऋण
चुकता नहीं होता। जैसे ही ऋण पूरा हो जाता है बंधन खत्म। हम जिनहे भी अपने आस पास देखते
है जैसे हमारे माता पिता, बंधु सखा ये सब कर्म बंधन के कारण ही है। अगर
आज आपने किसी की हानी की, किसी को दुख पहुंचाया तो आप उसके ऋणी
हो गए। वह जीवात्मा कभी न कभी आपसे वह ऋण सूत समेत वसूल करेगी। चाहे 2 जन्म और लेने
पड़े। इसलिए ऐसा दोष रहित जीवन जीने के लिए
मन पर काबू होना अत्यधिक आवश्यक है। मन कमजोर हो तो सारी बुरी प्रवत्तियाँ प्रबल हो
जाती है।
प्रभु नाम सुमिरन और ध्यान योग की उपासना से जीवन को सुखमय बनाने
के लिए हमेशा तत्पर रहे।



