Monday, February 4, 2013

कविता - मेरा भारत देश




मेरा भारत देश

इतिहास की पुस्तक मे देखा मैंने स्वर्णिम कल
जहां भारत देश था मेरा युग परिवर्तन विकल।

राम की मर्यादा जहां और शुश्रुत का ज्ञान था
पंच धर्मो की जननी वह भारत देश महान था।

महावीर जहां जन्मे और बुद्ध का विस्तार था
नानक संग देश मेरा विश्व का अवतार था|

सिंधु तट पर जन्म हुआ, थी एक नयी दुनिया
सब कहते है देश मेरा, थी सोने की चिड़िया।

कनक समान चरित्र राम-राज का भाव था।
सत्य प्रेम और करुणा का ना अभाव था।

पुस्तक से बाहर आया तो घोर अंधकार था।
नफरत और शोषण ही धर्म का आधार था।

 सोचा समझूँ जरा अब मैं आज के भारत को
बहुत पढ़ा किताबों मे मंदिर और मजारों को।

मैंने पूछा एक से – “क्या भारत को देखा है?”
कौन सा भारत कैसा भारत अपनी तो बस पेट-पूजा है।

एक पंडित से पूछा मैंने - क्या भगवान को देखा है?
बोला दो फूल चार लड्डू यही तो खाकर बैठा है।

फिर एक से पूछा ये नेता कैसा होता है?
सफ़ेद गाड़ी पुच्छल तारा कभी-कभी दिखता है।

फिर पूछा टीचर से – पढ़ा था मैंने भारत मे अच्छे लोग ही होते है,
लेकिन यहाँ तो बच्चे बिलख बिलख रोते है?
टीचर बोली – चोर लुटेरे अब यहाँ सरदार बने बैठे है
बच्चों का दूध भी अब नेता ही पी जाते है।

फिर एक बोला - बाहर मत जा आज तो होता दंगा है
राम और रहीम का ये अजीब पंगा है।

साभार – मनीष

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