Wednesday, March 6, 2013

सुधर जाओ नेताओं

 
सूरज छिप गया था कहीं बादलों मे, अंधकार था इतना घना
अन्ना तुम क्या आए रोशनी आ गयी जिसकी न थी कल्पना।।
 
डरे डरे रहते थे हम इन आदमखोर सियासददानों से
भूल ही गए थे कभी मिलता था खाना इन गरीब मकानों में।।

सुन सकता हूँ फिर आवाज़ आ रही है आज मेरे कानों मे
भारत छोडो काले अंग्रेजों निकल पड़ी है तलवारें अपनी-अपनी मयानों से ।।
 
आज नहीं खरीद सकते हमें तुम, न हम बिकते दुकानों मे
माँ कि लाज बचानी है अब नहीं डरते हम इन हुक्मरानों से।।
निकल पड़े है सब मिलकर टक्कर लेने चट्टानों से, अब खैर नही तुम्हारी
हम लेते आशीर्वाद मंदिरों मे और दुआ मांगी जाती अज़ानों मे।।
 
तिरंगा आज थामा है हमने अब ये है जान से प्यारा
मर भी गए तो कब्र पर आएंगे लोग करने दीदार हमारा।।
नेताओं तुम खैर मनाओ अब अपनी, कब तक खुद को बचाओगे
लोकपाल आने के बाद या तो जेल जाओगे या मिट्टी मे मिल जाओगे।।
 
अरे नेताओं काम करो कुछ ऐसा सुभाष और गांधी के साथ नाम आए
नहीं सुधरे कहीं ऐसा न हो फोटो पर बच्चा भी पैंट खोल सुसू कर जाए।।

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