Tuesday, February 5, 2013

क्या जातिवाद अभिशाप नहीं?


क्या जातिवाद अभिशाप नहीं?

हिन्दू संस्कृति की महानता पर अगर कुछ लेख लिखना शुरू करू तो शायद दिन कम पड़ जाए लेकिन वो शब्द मेरे न होंगे क्योकि मैं जो भी लिखूंगा वह सिर्फ सुनी सुनाई बातें होंगी। हिन्दू संस्कृति की महानता मैंने सिर्फ किताबों मे पढ़ी और लोगो से सुनी है। जो देखा वो बिलकुल विपरीत है।

मैंने सुना हिन्दू धर्म दया, साहिश्रुता और त्याग का प्रतीक है लेकिन मैंने दुनिया का ऐसा कोई और धर्म नहीं देखा जिसमे इतना भेदभाव है। कोई और ऐसा धर्म नहीं जिसमे धर्म के नाम पर लोग अपनों के लिए इतनी घृणा और तिरस्कार का भाव रखते है।    

जब हिन्दू समाज की कुरीतियों पर नज़र जाती है तो दिल बेचैन हो जाता है। सोचता हूँ ऐसा क्या सोचा होगा हमारे ऋषियों ने जो लोगो को जतियों और वर्णो मे बाट दिया। दुख होता है जब देखता हूँ किस तरह ऊँची जातियाँ निम्न जतियों का शोषण करती है। जब देखता हूँ किस तरह निम्न जातियों मे पैदा हुए अभागे आत्मसम्मान के लिए तरसते हैं।

हिन्दू संस्कृति ने हमेशा आत्म-सम्मान से जीना सिखाया शायद इसीलिए मुग़लों और अंग्रेजों के क्रूर 1000 साल के शासन के बाद भी देश मे आज हिन्दू संस्कृति जीवित है। गुरु गोविंद सिंह, छत्रपती शिवाजी, झाँसी की रानी जैसे वीरों ने इस संस्कृति को जीवित रखने के लिए अपना बलिदान दिया और समाज के लिए प्रेरणा श्रोत बने।    

किसी भी समाज मे संतुलन का आधार ज्ञान, धन और बल है। अगर ये तीनों किसी एक के हाथ मे केन्द्रित हो जाए तो समाज मे असंतुलन व्याप्त हो जाता है। इसी ज्ञान को आधार मानकर महान ऋषियों ने समाज को चार वर्णो (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्र) मे बांटा।

ब्राह्मण – जो ज्ञान अर्जित करता है वो ब्राह्मण है। लेकिन ज्ञान के इन पिपासुओं के लिए धन या सत्ता  वर्जित थी। भिक्षा मे मांग के खाना ही ब्राह्मण कहलाने का अधिकारी है। इनका मुख्य उद्देश्य ज्ञान के द्वारा समाज का कल्याण व मार्गदर्शन था। 

क्षत्रिय – जिनहोने शस्त्र उठाकर देश व समाज की रक्षा का भार उठाया वो क्षत्रिय कहलाए। इनका मुख्य उद्देश्य समाज का रक्षा करना था। 

वैश्य – इस श्रेणी मे वो लोग आते है जिनहोने व्यापार को अपना कर्म चुना। इनका मुख्य उद्देश्य धन के द्वारा समाज का कल्याण करना था।

शूद्र –मानव सेवा को जिनहोने अपना धर्म बनाया वो शूद्र कहलाए। इनकी ज़िम्मेदारी समाज और वातावरण को स्वच्छ रखने की थी।

लेकिन समय के साथ हिन्दू धर्म मे घोर परिवर्तन आए। अब लोग कर्म से नहीं जन्म से जाने जाते है। ब्राह्मण कुल मे पैदा हुआ एक चोर भी खुद को शूरवीर मानता है।  क्या ऐसे समाज पर किसी को गर्व हो सकता है जो अपने ही भाइयों को धर्म के नाम पर जिल्लत भरी जिंदगी देता हो? जो भाई खुद को कट्टर हिन्दू बोलकर सुबह शाम धर्म का डंका पीटते है मैं उनसे पूछना चाहता है ऐसा क्या है जिसपर आपने इतना गर्व करते है? अधिकांश शहरों मे रहने वाले जिनहोने कभी गाव देखा नहीं या कभी वहाँ रहे नहीं आपसे विनती है जरा गाव मे जाकर रहे और देखे कितनी घृणा और अत्याचार व्याप्त है लोगों मे।

आज भी दलितों को इंसान नहीं समझा जाता। न साथ पढ़ते दिया जाता है न खेलने। न साथ रहने दिया जाता है न खाने। अगर कोई दलित घर के अंदर आ जाए तो गंगा-जल से घर पवित्र करते है। हर पल उन्हे ये एहसास दिलाया जाता है की वो दलित है। मै थूकता हूँ ऐसी मानसिकता पर।  राम के नाम का डंका पीटने वाले भूल जाते है की राम ने शबरी के झूठे फल भी खाये थे।

बचपन मे पढ़ा था भारत देश अनेकताओं मे एकता का देश है लेकिन हिन्दू धर्म मे ये बात ठीक नहीं बैठती क्योकि इसमे एकता नहीं है। हर कोई या तो पंडित है या ठाकुर। या तो बनिया है या दलित। या तो यूपी वाला है या मराठी। या तो गुजरती है या हरयानवी।

हिन्दू कहलाने का अधिकारी  सिर्फ वही है जो जात-पात या क्षेत्रियता से ऊपर उठकर सोच सके बाकी तो मेरी नज़र मे सिर्फ ढोंगी है।

साभार – मनीष

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