Wednesday, March 6, 2013

भक्ति और मन का संबंध


अधिकांश लोगों के मन मे प्रभु दर्शन कि लालसा हमेशा बनी रहती है फिर भी इस सुख से हमेशा वंचित रहते है। कुछ लोग मंदिर जाकर प्रभु से सिर्फ सौदेबाजी करते है तो कुछ फूल और 2 लड्डू चढ़ा कर जिम्मेदारी पूर्ण समझते है। किसी के तो सामने भगवान स्वयं प्रकट हो जाते है और किसी-किसी को जन्मो इंतज़ार करना पड़ता है। कुछ प्रश्न जो अधिकांश लोगो के मन मे रोज़ उठते होंगे।

“मैं रोज़ 1 घंटा सुबह माला फेरता हूँ। रोज़ आधा घंटा पोथी पढ़ता हूँ। मैं मंत्र जाप भी करता हूँ लेकिन भगवान है की खुश ही नहीं होते। मैं मंदिर भी जाता हूँ, माला भी चढ़ाता हूँ, भोग भी लगाता हूँ लेकिन फिर भी भगवान खुश नहीं होते। आखिर भगवान को ऐसा क्या चाहिए जो मैं नही कर सकता?”

ऐसा क्यों होता है जब हम किसी संत या महात्मा को देखते है तो मन मे ऐसे ख्याल आते है “ये मानव नहीं महा-मानव है” उन्होने ऐसा क्या किया जो हम नही कर सके?

प्रश्न ये उठता है की क्या भगवान पाठ करने, मंदिर मे घंटा बजाने, पोथी पढ़ने या मंतर करने से खुश होता है? अगर होता तो मंदिर के पुजारियों को प्रभु-दर्शन सुबह-शाम क्यों नहीं होते? कभी सोचा जो लोग सुबह शाम घंटा बजाते है या पोथी पढ़ते है उन्हे भगवान के प्रेम की अनुभूति क्यों नही होती?  क्यों वो इस प्रेम के सागर की एक बूंद को भी तरसते रहते है? और अगर भगवान मंदिर के घंटे या मंतर से खुश नहीं होते तो ऐसा क्या है जिससे भगवान खुश होते है?

मित्रों इस प्रश्न का उत्तर बहुत ही सरलता के साथ धन्ना भगत की लोक कथा पर आधारित दारा सिंह द्वारा सन 1974 में कृत फिल्म “किसान और भगवान” मे देखने को मिलता है। किस तरह अनपढ़ गँवार धन्ना भगत के मन की सरलता को देख प्रभु हरी धन्ना का दास बन उसके सारे कार्य पूर्ण करते है।

कबीर दास जी कहते है – पोथी पढ़ पढ़ कर जग मुआ पंडित भया न कोए। ढाई आखर प्रेम का पढ़े जो पंडित होए॥

अगर इतिहास के पन्नों को पलटे तो ऐसे बहुत उदाहरण देखने को मिलेंगे जहां श्रद्धा से चढ़ाया हुआ एक फूल ही काफी था प्रभु दर्शन को। प्रभु तो सिर्फ भावना के भूखे है।     

मन का स्थान भक्ति से ऊपर है। मन भाव है और भक्ति भाव का कर्म मे परिवर्तित रूप है।  मंदिर मे आरती करना , घंटा बजाना, मंतर करना, जाप करना, पोथी पढ़ना, हवन करना ये भक्त का भगवान के प्रति अपनी भावना प्रकट करने का साधन मात्र है लेकिन अगर इस कर्म से प्रेम भाव विरक्त हो जाए तो यह कर्मकांड व्यर्थ सिद्ध होगा। यह एक कटु सत्य है की भक्ति के मार्ग मे बिना मन या भाव के किए गए कर्म का कोई स्थान नहीं होता।

सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह उठता है कि मन को कैसे लगाए?  यह तो वो बेलगाम घोडा है जो कभी बस मे नहीं आता। जब पाठ करता हूँ तो ये ऑफिस की सैर कर रहा होता है। जब आरती करता हूँ तो ये नयी फिल्मों के बारे मैं सोच रहा होता है। मन तो उसी से लगता है जिसपर आसक्ति होती है, जिससे प्रेम होता है? जो कुछ भी मन को पसंद है वह हमेशा वही करने को उद्यत रहता है ।

सवाल यह भी है भगवान से प्रेम कैसे हो? प्रेम होगा तभी तो मन लगेगा। मन लगेगा तभी भक्ति भाव से किए गए कर्म प्रभु तक पहुचेंगे।

आपको यह जानकार अचंभा होगा दुख भगवान तक पहुचने की पहली सीढ़ी है। दुख की अवस्था मे किया गया प्रभु सुमिरन सामान्य अवस्था मे किए गए सुमिरन से काफी अलग होता है। महाभारत मे श्री कृष्ण जब कुंती से पूछते है उन्हे क्या चाहिए तब कुंती कहती है – हे प्रभु दुख और मेरा साथ कभी ना छूटे। जब भी मुझे पीड़ा होती है आप रक्षा करने आ जाते हो जिससे मुझे आपके दिव्य दर्शन होते है। आपके तो दर्शन मात्र से ही कर्म बंधन छिन्न-भिन्न हो जाते है और जन्म-मृत्यु के इस बंधन से मुक्ति मिल जाती है।   

अगर प्रभु भजन मे मन नहीं लगता तो निराश न हो। प्रभु को अत्यंत प्रिय कुछ ऐसी सरल बातें हैं  जिन्हे अपनाकर आप अपना जीवन स्वर्ग बना सकते है।

1॰ भूखों को खाना खिलाना – ये सबसे बड़ी मानव सेवा है। भूखों को खाना खिलाने वाले के दिल मे अपार प्रेम होता है और यह प्रभु को अत्यंत प्रिय है।

2॰ अहंकार का त्याग – “मैं मेरा मुझसे” इन शब्दो को अपने शब्दकोश से निकाल दे। “मैं” अहंकार का प्रतीक है। अहंकार रहित बच्चो को प्रभु के दरबार मे बिन मांगे मोती मिलते है।

3॰ कर्म मे कर्ता का भाव ना होना – अपना हर कर्म अच्छा या बुरा प्रभु को समर्पित कर दे। इससे आप कर्म बंधन से मुक्त हो जाएंगे। आपके द्वारा किए गए हर अच्छे ये बुरे कर्म का उत्तरदायित्व प्रभु का होगा।

4॰ हर जीव पर समान प्रेम रखना – प्रभु ने कभी किसी जीव जैसे मानव, पशु, पक्षी मे भेद-भाव नही किया। फिर हम कौन होते है प्रभु की संरचना मे भेद-भाव करने वाले। कभी किसी का तिरस्कार कर पाप के भागीदार न बने।  

 5॰ हर दिन अपनी सहूलियत से थोड़ी देर शांति मे प्रभु की याद मे बैठना या उनका नाम सुमिरन करना और उन्हे इस जीवन के लिए धन्यवाद देना। मानव जीवन सबको नहीं मिलता। कुछ तो पुण्य किए होंगे वरना क्या पता किसी जीव-जन्तु कि योनि मे फंसे होते।  

इतना सब करने के बाद प्रभु को एक बार निहार लेना। प्रभु खुद समक्ष आ जाएंगे।

साभार – मनीष

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